Friday, August 22, 2008

तुम कब आओगे?

आज जब सारा देश जन्माष्टमी की तैयारी कर रहा हैं,भगवान श्रीकृष्ण का जन्म दिवस मनाने के लिए घर,आँगन,मन्दिर,सजा रहा हैं। तब मेरी नज़रे तुम्हे क्यों ढूंढ़ रही हैं?क्यो मेरे ह्रदय में तुम्हारे नामो की 'नामरश्मिया' ज्योतिरमय होकर अंतर्मन को तुम्हारे ही प्रकाश से आलोकित कर रही हैं?क्यो मेरा कंठ अविरत रूप से एक ही नाद का गान कर रहा हैं?मन मस्तिष्क बारम्बार एक ही प्रश्न पूछ रहा हैं कि, तुम कब आओगे?......................................
हे कृष्ण तुम कब आओगे?

वैसे तो तुम्हे सारा संसार भगवान मानता हैं,पर मैंने तुम्हे कभी भगवन माना ही नही,मैंने तुम्हे हमेशा अपना मित्र माना,सखा माना। भगवान मानती तो शायद तुमसे दूर हो जाती,तब
तुम ईश्वर होते और मैं भक्त रह जाती। तुमसे शायद खुलके अपने दुःख - दर्द न कह पाती,इसलिए तुम्हे अपना मित्र माना और बचपन से ही तुमसे अपना हर सुख- दुःख बाटा। पर आज तुमसे जो कहने जा रही हूँ ,वह शायद पूर्ण रूप से कभी नही कहा था ।

हे कृष्ण तुमने संसार को प्रेमयोग सिखलाया,हर किसी को प्रेम के एक सूत्र से बाँध लिया था . पर आज मनुष्यों के ह्रदय का प्रेम स्त्रोत सुख गया हैं,तुमने हर उम्र के व्यक्तियों से आत्मिक प्रेम करना सिखलाया,पर आज मनुष्य सिर्फ़ स्वयं से प्रेम कर रहा हैं।

हे योगेश्वर तुमने कर्मयोग बतलाया,निष्काम कर्म समझाया,पर आज का मनुष्य सिर्फ़ वही कर्म कर रहा हैं,जो स्वयं के लिए फायदेमंद हो ।

तुमने शान्ति और सुव्यवस्था से सुसज्जित द्वारका बसाई,अन्यायी राजाओ को पदच्युत कर,न्यायी राजाओ को राजगद्दी पर बिठाया,आज न्याय कही खो गया हैं मधुसुदन,भष्ट्राचार चहु ओर गाजरघास की तरह फ़ैल गया हैं ।

तुमने कभी कितने ही मनुष्य रूपी दानवो का संहार किया था,आज न जाने कितने दानव आतंकवाद फैलाकर मनुष्य जाती का जीवन,मृत्यु से भी कठिन कर रहे हैं।

हे द्रौपदी कि लाज बचाने वाले हृदयेश्वर,इस कलयुग में न जाने कितनी द्रौपदिया तुम्हे हर क्षण पुकार रही हैं।

तुमने बंसी कि धुन से त्रिलोको में संगीत का साम्राज्य स्थापित किया ,आज वही संगीत मृतप्राय सा हो रहा हैं,उसकी जगह न जाने किस दुर्गीत ने ले ली हैं,जिसमे स्वर नही,शब्द नही ,लय नही ओर मधुरता भी नही ।

तुमने कभी लक्ष्यविहीन,कर्म -अकर्म,जीवन- मरण के चक्रव्यूह में उलझे हुए अर्जुन को गीता बतलाई थी,आज सारा समाज लक्ष्यविहीन हो रहा हैं,सारा समाज अतृप्त हैं,हर कोई अर्जुन हैं यहाँ। इसलिए अधर्म-धर्म के चक्कर में उलझ कर शांति की खोज में न जाने कितने ढोंगी बाबाओ की शरण में जा रहा हैं ।

हे कृष्ण!तुमने कभी यहाँ समस्त नर- नारियो को जीवन दिया था,प्रेम दिया था ,कभी यहाँ की धरती को वृन्दावन किया था। हे करुणाकर! आज इस वसुधा को ,इस बंजर धरा को पुनः पित वस्त्र की आवश्यकता हैं ,यहाँ से वन खो गए हैं ,जल स्त्रोत सुख गए हैं ,तुम्हारे नीलवर्ण सम जल की यहाँ अत्यन्त आवश्यकता हैं।

इसलिए मेरे कृष्ण, मन बार बार पूछ रहा हैं ,तुम कब आओगे ? वैसे तो तुम हर जन्माष्टमी को हर मन्दिर में ,हर घर में आते हो ,पर आकर भी,शायद आते ही नही हो। इस बार एक ही प्रार्थना हैं तुमसे, भारत रूपी गोकुल के किसी न किसी घर में जरुर आओ,एक बार पुनः,कृष्ण,कान्हा बनकर इस भूदेवी के जनों को प्रेम का पाठ सिखलाओ,जीवन का मंत्र कंठस्थ कराओ,क्योकि तुम अब भी नही आए तो यह संसार प्रल्यंकित होकर,समाप्त हो जाएगा।
इसलिए हे मुरारी इस बार आओ,क्योकि तुम्हारी इस राधिका का मन सतत पूछ रहा हैं,तुम कब आओगे ?मोहन तुम कब आओगे ?

Thursday, August 21, 2008

कहाँ खो गई जिन्दगी?


मुंबई का बोरीवली स्टेशन,सुबह के पॉँच बजे का वक़्त, भीड़ की बढती आवाजो के साथलोकल की धडधडाती आवाज,लोकल रुकी,भीड़ का रेला,वायु से भी अधिक तीव्र गति के साथट्रेन में चढा और लोकल चल पड़ीमैं इस सब के लिए बिल्कुल नई थी,भीड़ में धक्के खातीहुई ,ट्रेन की तरफ बढ़ने की जगह; २५ कदम पीछे पहुँच गई,मेरे साथ और कई लोग थे जो ट्रेन में चढ़ नही सके थेअचानक हल्ला हुआ ,शायद कोई गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करतेसमय,गाड़ी के नीचे गिर गया थाकुछ मानवीय अंत:करण वाले मानवो ने उसे बाहरनिकालने की कोशिश की,पर;तब तक देर हो चुकी थी .इस वाकये ने मुझे झिंझोड़ कर रखदिया,उस दिन मन किसी काम में नही लगा ,फ़िर धीरे-धीरे इस सब की आदत होनेलगी,रोज़ सुबह की धक्कम- धुक्की के बाद गाड़ी पकड़ना,इस बीच कुछ इंसाननुमा प्राणियोको गिरते-पड़ते देखना ,और बाकियों का इसे नज़रंदाज़ कर देनामैं देखती, यह सब प्राणीसुबह - बजे अपने- अपने होटल रूपी घरो से निकल जाते,दिन भर दौड़ भाग करते,कभीऑफिस के लिए,कभी काम के लिए,कभी चार पैसो के लिए,कभी जीने के लिएरात के-१०-११-१२ बजे कभी शायद अपने उन्ही घरो को पहुँचते , जहा इनका कुछ क्षणों का बसेराहुआ करता

फ़िर मैं दुसरे शहरो में गई, देखा; वहां लोग रोज़ ही अप- डाउन कर रहे हैं,और नही भी करेतो भी सुबह के निकले,रात तक ही घर पहुँच रहे हैं,किसी को,किसी के लिए फुर्सत नहीहैं....पत्नी को पती के लिए,भाई को बहन के लिए,सास को ससुर के लिए,बच्चो को माँ -बाप केलिएसब अपने अपने कामो में व्यस्त हैं . कोई दुखी हैं,परेशान हैं,पर कोई नही जो उसकेदुःख को सुने,चार अच्छी बातें करे,अरबो-खरबों की इस भीड़ में इन्सान रूपी प्राणी बिल्कुलअकेला हैं

एक समय था जब इस धरती पर इन्सान रहा करता था,वह अपनों से मिलता,उनके सुख दुःख बाटता,उनकी खुशियों में झूमता,गमो में रोता,वह निसर्ग से बाते करता,उसके पास खुदके लिए थोड़ा वक़्त होता,जब वह ख़ुद से बाते करता,अपने शौक पुरे करता,वह गुनगुनाता,गाता,नाचता,चित्रकारी करता,कभी कोई कविता रचता,अपनों के साथ बैठकर खाना खाताकभी वह इन्सान इस धरती पर रहता था हम समय से होड़ करते हुए जाने कितना आगे बढ़ गए,सुख सुविधा के कितने ही उपकरण हमने बना लिए,पर वक़्त की इस दौड़ में;हमारे अन्दर का मानव कही पीछे ही छुट गया,मशीनों के इस युग में हम सिर्फ़ एक मशीन बनकर रहे गए,जो सारे काम करती हैं,पर उन कामो का आनंद नही ले पाती,वह पकाती हैं पर उसे खाने का आनंद लेना नहीआता,उसके पास रिश्ते हैं पर उन्हें निभाने का वक़्त नही, क्यों हुआ ऐसा ?

कही कही हम सब(सम्पूर्ण मानवजाती ) इसके लिए जिम्मेदार हैं, प्रतियोगिता के इस युग में हमने अपने आपको ही सर्वाधिक छला,कष्ट दिया हैंप्रतियोगिता में बने रहना और जीतने की जिद्द बुरी नही हैं,यह नही हो तो इन्सान लक्ष्य विहीन पथिक मात्र हैं,परन्तु इस जिद्द के चलते,अपने अंतर्मन की हत्या कर देना ,कहाँ तक उचित हैं ?कहाँ तक सही हैं अपनी संवेदनाओ को मार देना? आज का जीवन बहुत कठिन हैं,जीने के लिए सौ बहाने चाहिए,और उससे भी अधिक धन. पर थोड़े धन में,थोड़े सुखो में,इन्सान सुखी रहना सिख लेता तो,हमारे अन्दर का मानव मन तो जिन्दा रहता,कुछ ऐसे भी इन्सान हैं,जो इस सब में से थोड़ा समय स्वयं के लिए,अपनों के लिए चुरा लेते हैं,कभी बैठ कर कुछ लिखते हैं,कभी दूसरो से कुछ सुनते हैं,कुछ चित्रकार आज भी निसर्ग से रंग चुरा लेते हैं,पर ऐसे प्राणी जो वास्तविक अर्थो में इन्सान कहलाये ,कम ही बचे हैं कही कही हम सबके मन में इच्छा हैं ,जीने की ,अपनों के साथ कुछ पल गुजारने की,हम सब जानते हैं की जिन्दगी खो गई हैं,और उसे हमे लौटा लाना हैं,इससे पहले की आने वाली पीढिया पुरी तरह मशीनीकृत हो जाए,मानव के वेश में रोबोट हो जाए





फोटो :http://static.flickr.कॉम,www.abc.नेट से साभार

Wednesday, August 20, 2008

गृह सुचना एवम सर्वेक्षण सह सर्वोच्च अधिकारी अर्थात कामवालीबाई

सुबह के बजे थे, मैं नाश्ता बनाने में व्यस्त थी,पर आज मन कही और था ,किसी और की यादो में खोया हुआ,किसी और के इंतजार में मग्न ,अंतर्मन में बैठी सुरली गायिका मधुर मधुर स्वर में गुनगुना रही थी ,"जरा सी आहट होती हैं तो दिल ये कहता हैं......कही ये वो तो नही ........कही ये वो तो नही.........कही ये वो तो नही....."अचानक दरवाजे की घंटी बजी ,पैरो को मानो पंख लग गए ,मैं हवा में उड़ती सी,पुरे उत्साह से भागती हुई दरवाजे तक गई,पुलकित मन से दरवाजा खोला,पर इस बार भी हर बार की तरह घोर निराशा मेरे हाथ लगी,आगंतुक कोई और था वह नही बुझे मन से,बोझिल कदमो से किचन में आई देखा तो सेंडविच बुरी तरह से जल चुका था ,यह वा सेंडविच था , जले हुए सेंडविच खाने के बाद पतिदेव को अब यह तीसरा जला सेंडविच खाना असंभव प्रतीत हुआ और बहुत पेट भर गया कहते हुए, ऑफिस जाने के लिए निकल गए

११ बज चुके थे मुझे अब कुछ कुछ गुस्सा भी आने लगा था,अचानक टेलीफोन की घंटी बजी,आशाओ ने फ़िर एक बार अपने पंख फैलाये,तुंरत फोन उठाया,सामने से आवाज आई ,मी सकू बाई बोलते ...............इसी आवाज को सुनने के लिए मन सुबह से बेचैन था,ह्रदय उत्सुक था,मैंने कानो को पुरा खोल लिया और कहा, बोलो... वह बोली,ऐसा हैं की मेरी तबियत ठीक नही मैं आज और कल नही आउंगी मानो वज्रपात हुआ मुझपर ,फ़िर भी खुदको सँभालते हुए कहा अच्छा ठीक हैं परसों तो आओगी ?जवाब मिला सोचूंगी ,- दिन में जाउंगी

११ दिन बीत चुके थे ,मेरा गुस्सा चरम सीमा पर था ,बिचारे पतिदेव और नन्ही बेटी मौन व्रत धारण कर चुके थे ,उन्हें समझ गया था की अगर वो कुछ बोले तो इस कामवाली की छुट्टी से उत्प्प्न क्रोधाग्नि उन्हें भी जला देगी ,इस बीच कई बार फोन किए उसे। संदेश मिलता फ़ोन इस व्यस्त हैं ,स्विच ऑफ़ हैं आदि आदि ,१२वे दिन वह आई....
....थकी, हारी, परेशान,मैंने पूछा क्या हुआ?क्यों इतनी छुटीया? ??
जाने क्या हुआ!!!!!!!!!!वह दनदनाती हुई बोली, देखो मुझसे फालतू सवाल मत पूछा करो, मैं काम छोड़ के जा रही हूँ .................. और वह चली गई

फ़िर नई काम वाली आई,ध्यान काम में कम और ताक- झाक में ज्यादा,वैसे भी वह कामवाली लगती नही थी,हाथ में मोबाईल,ब्रांडेड कपड़े ,खुले बाल,सधा हुआ मेकप और निर्धारित मांगे.. मैं हफ्ते मैं दिन छुट्टी करुँगी,हर महीने बोनस चाहिए ,रोज़ एक बार नाश्ता चाहिए,निर्धारित काम से एक काम ज्यादा नही करुँगी...
फ़िर भी काम पर रखा, रखनी तो थी ही,चार ही दिनों में उसे पता चल गया की घर में कौनसी चीज़ कहाँ हैं ?कहाँ पैसे हैं,कहाँ कपड़े हैं,कहाँ कागज़ हैं
जाने क्या क्या पूछती रहती ,आप के घर में कौन कौन हैं?सासु माँ की सासु माँ क्या करती हैं,नन्द की जेठानी की लड़की की सासु की बहन की बेटी कैसी हैं?मैं त्रस्त आख़िर मैंने उसे काम पर रखा था ,इसलिए की मेरी संगीत साधना,लेखन आदि के लिए मुझे समय मिल सके,पर यहाँ तो सारा समय इनके जवाब देने में ही जा रहा था,पर कुछ कह नही सकती थी,एक दिन मुझे किसी ने पूछा"राधिका तुम्हारी सहेली के पति के भाई को अच्छी नौकरी मिली?या वह अभी भी दुकान में कम कर रहा हैं? मैं हतप्रभ!!!!!!!!!!!!!!इन्हे कैसे पता?कहा, मिली,पूछ ही लिया; कैसे पता चला ?उन्होंने कहा,तुम्हारी कला बाई ने बताया.
समझ गई कि इस कला बाई को यह कला भी खूब आती हैं, तब से सावधान रहने लगी। कही कुछ निकल जाए उसके घर में रहते समय मेरे मुंह से। जब वह घर में होती मैं और मेरे पति आपस में बात ही नही करते थे

महीने काम और फ़िर छुटियो पर छुट्टिया कभी कोई मर गया हैं,कभी कोई जिन्दा हो गया हैं,कभी किसी कि शादी हैं,कभी कही घुमने जाना हैं
हद तो तब हो गई जब मैंने उससे छुट्टिया करने को कहा और उसने इस धमकी के साथ काम छोड़ दिया कि अब वह किसी बाई को मेरे यहाँ नही आने देगी।

१५-२० दिन नई काम वाली ढूंढ़ते निकल गए,सच कोई काम वाली आने को तैयार ही नही,मैं जब बाहर निकलती,औरते अजीब सी नजरो से मुझे देखती , एक दुसरे के कानों में कुछ कहती,मैं समझ नही पा रही थी की आख़िर हो क्या रहा हैं ?एक दिन हिम्मत करके ऐसे ही एक समूह से जाकर पूछा ,आख़िर उन्हें मुझसे समस्या क्या हैं ?सुनकर मेरे उपर मानो बिजली गिर गई पता चला की उस बाई ने सब जगह यह फैला दिया हैं,की मुझे जाने कौनसी मानसिक बीमारी हैं,जिसके चलते हर किसी पर चोरी का इल्जाम मढती हूँ और हर छोटी मोटी बात पर हंगामा खड़ा कर देती हूँ

अब कही जाकर समझ आई कामवाली बाई से बड़ा कोई अधिकारी हैं हो सकता हैं,यह आजकल की सुचना सर्वेक्षण अधिकारी तो हैं ही,साथ ही सब अधिकार प्राप्त सर्वोच्च अधिकारी भी हैं,जो कभी भी, कुछ भी कर सकती हैं यह महान हैं ,इनकी महानता शब्दों में कही जा सकती हैं छन्दों में अभिव्यक्त की जा सकती हैं।

इस सबके बाद एक ही व्रत लिया,चाहे थक के चूर क्यु हो जाऊ,चाहे लिख पाऊ या लिख पाऊ,चाहे आसमान टूटे,चाहे जमीन हिले,चाहे कुछ क्यों हो जाए मैं कभी कामवाली नही रखूंगी ..................