Thursday, August 28, 2008

चिंटू के स्कूल की छुट्टी ?नही!!!!!!!!!



चिंटू........ बिना उबला पानी,चिंटू रुको!!!!!!डॉ.साहब आपने ही तो कहा था की ८०%बीमारिया बिना उबले पानी से होती हैं ,फ़िर आप ही चिंटू को,अगर चिंटू को कुछ हो गया तो फ़िर स्कूल की छुट्टी होगी.डॉ.कहते हैं..................चांस ही नही .....

यह एड्वरटाइसमेन्ट जब पहली बार सुना तो पहले तो महिला की ओवर एक्टिंग पर हँसी आई,पर आखिरी वाक्य कि 'चिंटू के स्कूल की छुट्टी हो जायेगी',सुनकर मैं विचारो में खो गई,कि क्या सचमुच आज कि माये इतनी हैं बदल गई हैं कि बच्चे कि बीमारी से ज्यादा उन्हें स्कूल कि छुट्टी कि चिंता होने लगी हैं ?

पिछले कुछ सालो में विद्यालयीन शिक्षण के स्तर में भारी उछाल आया हैं ,साथ उछाल आया हैं डिग्री,डिप्लोमा करने वाले विद्यार्थियों में । आज का युग प्रतियोगिता का युग हैं ,जिसके हाथ में बड़ी बड़ी डिग्री हैं अनुभव हैं ,वो बड़ा नाम ,पैसा कमा रहा हैं, नए कोर्स ,विषय, तकनीक आई हैं .जिनके कारण समाज में शिक्षण के प्रति रुझान तो बड़ा ही हैं,साथ ही बढ़ी हैं प्रतियोगिता की भावना ,हर कोई डॉक्टर , इंजीनियर ,प्रोफेशनल बनना चाहता हैं,चाहता हैं की उसे बड़ी बड़ी कंपनी में नौकरी मिले,कोई बड़ा संवादाता बनना चाहता हैं तो कोई अच्छा सा कोर्स कर विदेशी डिग्री ले बड़ी सी कुर्सी पर बैठना चाहता हैं, किसीको टीवी पर आना हैं .इस सब में बढ़ी हैं प्रतियोगिता की भावना जिसके चलते कही न कही खत्म हो रहा हैं बचपन.
बचपन जो ईश्वर का अनमोल वरदान है ,आज हर माँ- पिता की इच्छा हैं की बेटा पढ़े,बेटी नाम करे ,वैसे यह स्वाभाविक इच्छाए हैं,कौन माँ पिता नही चाहते की बच्चे अच्छे निकले,किंतु आजकल कही न कही ये भी भावना आगयी हैं की मिंटू के 90%तो मेरे चिंटू के 99.99999999% तो आने ही चाहिए.आख़िर एडमिशन का सवाल हैं ,बड़ी आफत हैं बच्चो की, एक तो इतने सारे विषय ,उनसे सम्बंधित सारी किताबो का अध्धयन,स्कूल वर्क ,होम वर्क,और न जाने कितनी ट्यूशन .

जरा कक्षा एक के बच्चे का टाइम टेबल पढिये
मुन्नू नामक यह बालक सुबह ६ बजे उठ कर तैयार होकर ऑटो से स्कूल जाता हैं,1 बजे स्कूल से आकर,खाना खाकर तुंरत 1:30 मिनिट पर विघ्यान की ट्यूशन जाता हैं ,3 बजे वहा से लौट कर गणित की ट्यूशन जाता हैं ,4 बजे सिंगिंग क्लास ,6 बजे आकर बिस्किट खाकर 6:15 पर ड्राइंग क्लास जाता हैं 7 बजे वहा से लौट कर स्कूल करता हैं,9 बजे खाना खता हैं 10-11 होम वर्क करता हैं और सो जाता हैं .

आपको लगता हैं यह बचपन हैं ?इस बच्चे को खेलने -कूदने के लिए तो छोडिये, माँ पापा से बात तक करने की फुर्सत नही हैं ,कुछ माँऐ जो थोडी भावपूर्ण हैं उनके बच्चो को रोज़ 15-20 मिनिट का समय खेलने के लिए देती हैं. क्या हैं यह?? ये कैसा बचपन हैं?टीचर की डांट ,किताबो का बोझ,परीक्षा में माँ पापा ने चाहे,99%लाने का तनाव. यह क्या दे रहे हैं हम अपने बच्चो को?

इस भागम भाग में बच्चा कब बड़ा हो जाता हैं ख़ुद उसे भी पता नही चलता ,आख़िर क्या जरुरत हैं इस सबकी?

यह तथ्यपूर्ण सत्य हैं की हर इन्सान एक सामान गुण नही रखता ,हर व्यक्ति अलग हैं,उसकी इच्छाए अनइच्छाए अलग हैं ,रुचिया, क्षमताये अलग हैं ,हम अगर चिंटू को बिल्कुल मिंटू बनाना चाहे तो वह मिंटू नही तो नही बनेगा पर एक विचित्र मनुष्य जरुर बन जाएगा जो जिन्दगी में सब कुछ होकर कभी सुखी नही हो पायेगा,कयोकी उसके पास वह नही होगा जो वह वाकई चाहता हैं ,और उसने जो पाया हैं उसके लिए जो खोया हैं उसका दुःख जिन्दगी भर उसे सलाता रहेगा .

आज हम रो रहे हैं नौकरिया नही हैं ,बड़ी कठिन लाइफ हैं,पर एक बार सोचे हमने बड़े बड़े कोर्ससो से उपजे घ्यान पर आधारित उपलब्धताओ को ही कैरियर आप्शन माना हैं ,किंतु और भी बाते हैं जो हम कर सकते हैं ,हम कलाओ के बारे में गंभीरता पूर्वक सोच कर इन्हे अपना कैरियर बना सकते हैं,कोई भी काम छोटा बड़ा नही होता ,हम छोटी सी शुरुवात कर कोई वयवसाय कर सकते हैं. हमारा देश कृषि प्रधान है ,कृषि से सम्बंधित विषयों में हम दक्षता ग्रहण कर सकते हैं .

जरुरत हैं गहन विचार कर उसे अमल में लाने की,भेड़चाल चलकर तो हम अपना और अपने बच्चो का भविष्य खराब कर रहे हैं . तो जरा इस बात पर गौर करे,बच्चो बच्चा रहने दे,उनके स्वाभाविक गुण अपने आप जागने दे,उन्हें एक मौका दे उनके हिसाब से जिन्दगी जीने का ,सोचने का,वस्तुओ को देखने का,उन्हें मार्गदर्शन दे,पर जिस रास्ते दुसरे जा रहे हैं उस रास्ते खीचकर न ले जाए,तभी उनका और हमारा ,साथ ही देश का भला हो सकता हैं .

Wednesday, August 27, 2008

मोबाईल,कलाकार और रिंगिंग ध्वनी


फुनवा के दिन बीते रे भैया अब मोबाईल आयो रे ,गीत खुशियन का लायो रे .............ओ SओS ओS ओS ओ................ तो जे हैं आज के जुग की सबसे बड़ी ख़बर, कि गाँव गाँव और शहर शहर मा मोबाईल पहुँच गयो हैं ,पानी नही पहुँच पायो ,स्कूल नही आयो ,पहुंचे गयो हैं मोबाईल,ओ ओ काकी .....ओरी ताई जरा सुनियो .......का कहत हैं जे राधिका ,का बतावत हैं?नई कहानी ...............न हैं कोई राजा न कोई रानी ,कुछ गीतों कि जुबानी ,कड़वी खट्टी बानी ।

तो सुनिए भाईसाहब,और दीदी जी यह हैं मोबाईल और उसकी रिंगिंग टोन कि कहानी........

पिछले कुछ साल से मोबाईल टेक्नोलोजी में क्रन्तिकारी परिवर्तन हुए हैं ,सुधारनाए हुई हैं,कहाँ तो लोग ऐस. टी. डी. के लिए पब्लिक बूथों पर लम्बी लम्बी लाइन लगाते थे और कहा अब घर घर में फ़ोन हो गया हैं,अजी! घर घर की कहानी क्या सुनानी?वही नाना वही नानी ,यहाँ तो हेर जेब में हर पर्स में फोन हैं यानि आज के युग का सर्वाधिक तीव्र गप्पे मारने का साधन हैं मोबाईल। रोज़ नए नए ढंग के मोबाईल बाज़ार में उतारे जा रहे हैं,गाने वाला मोबाईल,सुनने वाला मोबाईल,फोटो वाला मोबाईल,वीडियो वाला मोबाईल,कम पैसे वाला मोबाईल,ज्यादा पैसे वाला मोबाईल,लड़कियों के लिए सुंदर गुलाबी मोबाईल,तो लड़को के लिए ज्यादा तकनिकी गुणवत्ता वाला मोबाईल,हर शहर कि हर गली में एक मोबाईल स्टोर और हर स्टोर में हजारो तरह के मोबाईल ।
क्या हैं न कि भारतीय जनता आवश्यकता से अधिक संगीत प्रेमी हैं ,इसलिए हर मोबाईल में गाने डाउनलोड करने,भेजने,सुनने सुनाने कि उत्तम वयवस्था ,फ्री रिंग टोन और इस सब में गत बजाने वाले कलाकार कि दुर्गत ।

जी हाँ इस मोबाईल ने जहाँ आम जनता को सुख समुद्र में डुबो रखा हैं वही कलाकारों को आंसू निकालने पर भी मजबूर कर दिया हैं । अब मेरी ही बात लीजिये ,२ साल पहले मुंबई में एक काफी बड़े कार्यक्रम में, काफी बड़े हॉल में वीणा वादन की प्रस्तुति दे रही थी , मेरा और सभी श्रोताओ का मन वीणा की सुरील लहरियों में खो चुका था की अचानक किसी का मोबाईल बजा ........... मुन्ना भाई MBBS,मुन्ना भाई .................

एक अन्य कलाकार के साथ तो इससे भी बुरा हुआ ,ख्याल गायन चल रहा था ,बोल थे
"आज आनंद ही आनंद गोकुल में ,आज आनंद ही आनंद" ,श्रोता भी आनंद से विभोर हो रहे थे,एक महिला का मोबाईल बजा .....आ सोचा तो आंसू भर आए मुद्दते हो गई मुस्कुराये ...........

एक संगीत विद्यालय का गुरुपूर्णिमा उत्सव चल रहा था ,गुरु जी गा रही थी ,गुनियन की सुनो गुनियन की मानो ,जो माने गुनियन की सो सब सुख पावे ,एक विद्यार्थी का मोबाईल बजा ............ऐसी की तेसी क्या कर लेगा जमाना .............


एक संगीतकार राग दीपक में गा रहे थे "धरती जले अम्बर जल रहा" ....किसी का मोबाईल बजा ............. "रिमझिम रिमझिम बरसे बदरिया आज मोरे अंगना .."

अजी यह भी सह लिया लेकिन कुछ लोगो के मोबाईल की रिंगिंग टोन तो इतनी अजीब अजीब किस्म की होती हैं की क्या कहिये ,अब सुनिए जब एक रिंगिंग टोन की वजह से मेरा हार्टअटेक होते होते रह गया । हुआ यूँ की मैं बजा रही थी कोमल स्वभाव वाला राग बिहाग,सब सुनने में मगन ,एकदम पिन ड्राप साइलेंस था,बस मेरी वीणा के स्वर गूंज रहे थे,अचानक ऐसी भयंकर आवाज आई मानों सौ-सौ पहाड़ एक साथ गिर गए हो ,भूकंप आ गया हो.मेरा दिमाग हिल गया ,हाथ से शालिग्राम शिला (जिससे मैं वीणा बजाती हूँ)उछली और सीधे पब्लिक के पास जा गिरी,मेरे होश फाख्ता!१ मीनट बाद मैं और श्रोता दोनों को समझ आया की आख़िर हुआ क्या हैं? दरसल एक महाशय का मोबाईल बजा ,रिंगिंग टोन थी - एक दैत्य की हँसी -जी यह उस रिंगिंग टोन का नाम था ,और उसमे बिठायी गई थी,डरावनी,जोरदार,भयंकर हँसी,वो भी पुरी आवाज में .........महाशय को झिड़का ,हॉल से बाहर जाने का निर्देश दिया,दिमाग को शांत किया फ़िर कही जाकर वीणा वादन शुरू हुआ .

तो ऐसी बुरी अवस्था कर डाली हैं इस मोबाईल ने हम कलाकारों की क्या कहियेगा की हमे अब गाने वाले मोबाइलों से डर लगने लगा हैं जी,लोगो को एक पल भी मोबाईल के बिना जी लगता नही और मोबाईल अगर बज जाए तो हमसे कुछ बजता नही ।

Monday, August 25, 2008

अजी सुनते हो ?


अजी सुनते हो?महारानी के कक्ष में से एक तीव्र आवाज आई,घर के महाराज रंककुमार जी हडबडा कर पेपर निचे रख कर उठ बैठे और मिमियानी सी आवाज में कहा............................... "आया छुटकू की अम्मा"!डरते-डरते लडखडाते कदमो से महारानी दुर्भाग्यमती जी के कक्ष में पहुँचे,और ह्रदय पर हाथ रखकर धीमे स्वर में पूछा,क्या हुआ दुर्भागीदेवी? फ़िर एक तीव्र आवाज़ आई, मानो करेले की सारी कड़वाहट स्वर में भर गई हो................"सुबह से पेपर मुंह पर चिपकाए बैठे हो ,दीखता नही,छुटकू कब से रो रहा हैं,मुझे अभी सतरा काम हैं ,तुम तो कुछ करोगे नही,सब जगह मुझे ही मरना हैं ,कल कहा था जरा इलेकट्रीशियन को बुला लाओ,कूलर काम नही कर रहा ,पर तुम्हे अपने पेपर से फुर्सत मिले, तब न ?"रंक महाराज जी घर कि हालत से अच्छे से वाकिफ़ थे मियाँ - बीवी दोनों के नौकरी करने के बाद भी इस महानगरी में घर का खर्च पुरा नही बैठता था,उपर से ये रोज़ रोज़ की झिक झिक !शांत स्वर में बोले..नाराज़ क्यो होती हो मधु, अभी बुला लता हूँ । फ़िर शब्दों कि मार .."अब अभी जाने कि जरुरत नही हैं ,जरा मौका मिला नही बहार जाने का की खुश!घर में सारे काम बाकी हैं ऑफिस भी जाना हैं,छुटकू को संभालो." बेचारे चुप मार के रह गए ।

तीन घंटे बाद .................................................................................................
"दुर्भागी................................... " मेरे मोजे कहाँ हैं ,जूते कहाँ गए ?और मेरा ब्रेकफास्ट तैयार हुआ कि नही?तबसे छुटकू को लिए बैठा हूँ पर एक काम समय से हो तब न ,न जाने सारा समय कहाँ लगा देती हो ,और अब निकले या अभी भी साज श्रृंगार बाकी हैं?सारी फैशन इंडसट्री तो इनकी वजह से ही चल रही हैं,घंटो आईने के सामने खड़े होने के बाद भी मेकप पुरा ही नही होता,ऑफिस जा रहे हैं शादी में नही॥
दुर्भागी को मन ही मन गुस्सा आ रहा था,पर इस समय बोलने का मतलब था मुसीबत मोल ले लेना ,चुप रह गई ।

रात के ९ बजे .................."आते ही घर में टीवी,मैं कुछ कह रही हूँ पर ध्यान सुनने में हैं ही नही ,आज छुटकू कि मेडम कह रही थी कि कल पुरी फीस देनी हैं ,और मकानमालिक का किराया भी देना हैं,वाशिंग मशीन का इंस्टालमेंट देना भी बाकी हैं, इस बार अभी तक मेंटेनेंस भी नही दिया हैं.और ........... । अब रंक महाराज के सब्र का अंत हुआ,अँधेरी अमवास के काले बादल कि तरह या ..........भूकंप की तेज़ ध्वनी कि तरह......... गरजे ......."चुप करो घर में आते ही चिक- चिक-चिक-चिक जरा शान्ति से दो क्षण भी बैठने दोगी या नही?जरा भी टीवी नही देखने देती,आज से मैं टीवी देखूंगा ही नही .माँ ने सोचा था शादी के बाद बेटे को जरा सुख शांति मिलेगी ,पर यहाँ तो दिन रात की चिकचिक । " टीवी बंद................................... महारानी की बडबड शुरू। "हां मैंने भी सोचा था महारानी की तरह रहूंगी माँ बाप ने शादी कर दी और मैं भुगत रही हूँ" आसुंओ का सैलाब ..............और फ़िर शांति,किसी महायुध्द के बाद कि शांति कि तरह ।
६दिन बाद ..............आज दुर्भागी देवी जी की तबियत ठीक नही,बिस्तर पर पड़ी हैं और ये कौन हैं ?जो गरमा-गरम सूप लिए आ रहा हैं । अरे यह तो हमारे रंकमहराज हैं ........."सुनो मधुमालती ये सूप पिलो अच्छा लगेगा और छुटकू को मैं सुला देता हूँ,तुम चिंता मत करो",इस स्नेहिल भेंट से दूरभाग्यमति के अन्दर की मधुमालती जागी, वीणा से मधुर,कोयल की कुहू से मधुर स्वर में बोली... "सुनिए जी ! आप पर उस दिन यूँही नाराज़ हुई,मैं जानती हूँ की तुम नौकरी कि वजह से बहुत परेशान हो,उपर से मेरी झिकझिक, मुझे माफ़ कर दो अब मैं तुम्हे कुछ नही कहूँगी"।

दिन बाद............. "अजी सुनते हो,सारा दिन बस दोस्तों से टेलीफोन पर बातें चलती रहती हैं यह नही कि जरा छुट्टी हैं तो बिल जमा कर आयेंगे ",सामने से दूसरी आवाज़............."शुरू हो गई महारानी की चिकचिक जा रहा हूँ, कर रहा हूँ,जरा धीरज रखा करो। "
मंच पर पटाक्षेप ...............

तो भाइयो और बहनों यह था नाटक "शादी"....
और यही हैं शादी कि हकीक़त,पल में प्यार पल में तकरार । जिन्दगी भर यही चलता हैं पर फ़िर भी साथ रहता हैं ,रिश्ता बना रहता हैं , यही हैं शादी .सारे रिश्तो से उपर,अनोखा सुंदर रिश्ता,पति-पत्नी का जैसे हमारे रंक महाराज महारानी का.. .........................................



फोटो -http://cas.bellarmine.edu/ ://wedding.dharmeshpatel.कॉम से साभार

क्या इतना बुरा हूँ मैं माँ?


फ़िल्म तारे जमीं पर बहुत अधिक लोकप्रिय हुई ,न जाने कितने बच्चे-बुढे इस सिनेमा को देखकर रोने लगे,न जाने कितनो को अपना बचपन याद आया,और यह गाना ..............."मैं कभी बतलाता नही ,पर अंधेरे से डरता हूँ मैं माँ ,भीड़ मैं यु न छोडो मुझे,घर लौट के भी आना पाऊ माँ,क्या इतना बुरा हूँ मैं माँ..................
इस गीत बोलो ने सभी के अंतर्मन को छू लिया, एक बेटे की माँ को करुण पुकार ..मानो हर मन की बात इस गीत के शब्दों में कही गई हो ।

संसार में हर एक इन्सान को ईश्वर की और से मिलने वाला सबसे सुंदर रिश्ता होता हैं माँ का .माँ मानो माँ नही होती वह सारी उपमाओ,नामो,संघ्याओ से परे एक ऐसा दिव्य ईश्वरीय तत्व होता हैं जो हर व्यक्ति के लिए अनमोल होता हैं।

बचपन में माँ जब मेरे साथ होती थी तो लगता था जैसे एक सुरक्षा आवरण मेरे चारो और फैला हुआ हैं,एक अलग ही तरह की ज्योतिर्मयी रश्मिया मैं अपने चारो और महसूस करती थी,और महसूस करती थी सुरक्षा ।
मुझे लगता हैं कि हर बच्चे के लिए माँ यही स्थान रखती हैं,उसे माँ के पास होते समय बहुत अच्छा महसूस होता हैं,उस समय वह सारे संसार का राजा होता हैं,और कोई उसका कुछ नही बिघाड सकता ।

समय बहुत बदल गया हैं ,आज स्त्रियों ने भी उच्च शिक्षण प्राप्त कर लिया हैं ,और वे भी ऊँचा कैरियर कर नाम कमा रही हैं ,दिनों दिन महंगाई बढती जा रही हैं और पैसे कि जरूरते भी । इस कारण भी स्त्रियों को मज़बूरी में नौकरिया करनी पड़ रही हैं ।पर वो जो अभी नन्हा बच्चा हैं ,जो अभी ठीक से चलना,भागना भी नही जानता हैं ,जो अभी तक अपने सारे काम तक नही करना जानता हैं वो क्या जाने कि जिन्दगी कितनी कठिन हैं और माँ को कैसे ह्रदय पर पत्थर रखकर काम के लिए निकलना पड़ता हैं,वह सिर्फ़ माँ चाहता हैं ,उसका थोड़ा समय चाहता हैं .हम आप तो ईश्वर में विश्वास रखते हैं ,मुसीबत,दुःख के समय उसके पास दौडे चले जाते हैं ,पर उसे तो यह तक नही पता कि ईश्वर होता क्या हैं। उसके लिए तो उसकी माँ ही ईश्वर हैं ,संसार के सभी लोग,पदार्थ बाद में हैं पहले हैं तो उसकी माँ।

कुछ दिन पहले एक न्यूज़ आई थी कि कैसे एक नौकरानी उसके भरोसे छोड़ ऑफिस गई एक माँ की नन्ही सी फूलकुमारी को बुरी तरह से मारती हैं ,देखकर दिल दहल गया ,सच हैं मानवीय संवेदनाये जहाँ अपनों में खत्म होती जा रही हैं तो वह तो महज नौकरानी हैं, वह किसी के बच्चे की क्यों अपने बच्चे कि तरह परवरीश करेगी.अपवाद हो सकते हैं ।
जिन माताओ का बच्चो को छोड़ जाना अति आवश्यक हैं उनका दुःख मैं समझ सकती हूँ,पर मैंने बहुत सी ऐसी माताओ को भी देखा हैं ,जिन्होंने इन सब के बीच मैं से मध्यम मार्ग निकाला है ,ताकि वे अपने बच्चो को अपना समय और प्यार दे सके।
बच्चो का दुःख,माँ से दूर जाने का त्रास माँ ही समझ सकती हैं ,आख़िर उनके कोमल हृदयों में से यह पुकार निकलना कितना सही हैं कि.. ...........................................................................भीड़ में यु न छोडो मुझे , क्या इतना बुरा हूँ मैं माँ।


बेबी फोटो //www.mummieandme.co.uk/ से साभार

Friday, August 22, 2008

तुम कब आओगे?

आज जब सारा देश जन्माष्टमी की तैयारी कर रहा हैं,भगवान श्रीकृष्ण का जन्म दिवस मनाने के लिए घर,आँगन,मन्दिर,सजा रहा हैं। तब मेरी नज़रे तुम्हे क्यों ढूंढ़ रही हैं?क्यो मेरे ह्रदय में तुम्हारे नामो की 'नामरश्मिया' ज्योतिरमय होकर अंतर्मन को तुम्हारे ही प्रकाश से आलोकित कर रही हैं?क्यो मेरा कंठ अविरत रूप से एक ही नाद का गान कर रहा हैं?मन मस्तिष्क बारम्बार एक ही प्रश्न पूछ रहा हैं कि, तुम कब आओगे?......................................
हे कृष्ण तुम कब आओगे?

वैसे तो तुम्हे सारा संसार भगवान मानता हैं,पर मैंने तुम्हे कभी भगवन माना ही नही,मैंने तुम्हे हमेशा अपना मित्र माना,सखा माना। भगवान मानती तो शायद तुमसे दूर हो जाती,तब
तुम ईश्वर होते और मैं भक्त रह जाती। तुमसे शायद खुलके अपने दुःख - दर्द न कह पाती,इसलिए तुम्हे अपना मित्र माना और बचपन से ही तुमसे अपना हर सुख- दुःख बाटा। पर आज तुमसे जो कहने जा रही हूँ ,वह शायद पूर्ण रूप से कभी नही कहा था ।

हे कृष्ण तुमने संसार को प्रेमयोग सिखलाया,हर किसी को प्रेम के एक सूत्र से बाँध लिया था . पर आज मनुष्यों के ह्रदय का प्रेम स्त्रोत सुख गया हैं,तुमने हर उम्र के व्यक्तियों से आत्मिक प्रेम करना सिखलाया,पर आज मनुष्य सिर्फ़ स्वयं से प्रेम कर रहा हैं।

हे योगेश्वर तुमने कर्मयोग बतलाया,निष्काम कर्म समझाया,पर आज का मनुष्य सिर्फ़ वही कर्म कर रहा हैं,जो स्वयं के लिए फायदेमंद हो ।

तुमने शान्ति और सुव्यवस्था से सुसज्जित द्वारका बसाई,अन्यायी राजाओ को पदच्युत कर,न्यायी राजाओ को राजगद्दी पर बिठाया,आज न्याय कही खो गया हैं मधुसुदन,भष्ट्राचार चहु ओर गाजरघास की तरह फ़ैल गया हैं ।

तुमने कभी कितने ही मनुष्य रूपी दानवो का संहार किया था,आज न जाने कितने दानव आतंकवाद फैलाकर मनुष्य जाती का जीवन,मृत्यु से भी कठिन कर रहे हैं।

हे द्रौपदी कि लाज बचाने वाले हृदयेश्वर,इस कलयुग में न जाने कितनी द्रौपदिया तुम्हे हर क्षण पुकार रही हैं।

तुमने बंसी कि धुन से त्रिलोको में संगीत का साम्राज्य स्थापित किया ,आज वही संगीत मृतप्राय सा हो रहा हैं,उसकी जगह न जाने किस दुर्गीत ने ले ली हैं,जिसमे स्वर नही,शब्द नही ,लय नही ओर मधुरता भी नही ।

तुमने कभी लक्ष्यविहीन,कर्म -अकर्म,जीवन- मरण के चक्रव्यूह में उलझे हुए अर्जुन को गीता बतलाई थी,आज सारा समाज लक्ष्यविहीन हो रहा हैं,सारा समाज अतृप्त हैं,हर कोई अर्जुन हैं यहाँ। इसलिए अधर्म-धर्म के चक्कर में उलझ कर शांति की खोज में न जाने कितने ढोंगी बाबाओ की शरण में जा रहा हैं ।

हे कृष्ण!तुमने कभी यहाँ समस्त नर- नारियो को जीवन दिया था,प्रेम दिया था ,कभी यहाँ की धरती को वृन्दावन किया था। हे करुणाकर! आज इस वसुधा को ,इस बंजर धरा को पुनः पित वस्त्र की आवश्यकता हैं ,यहाँ से वन खो गए हैं ,जल स्त्रोत सुख गए हैं ,तुम्हारे नीलवर्ण सम जल की यहाँ अत्यन्त आवश्यकता हैं।

इसलिए मेरे कृष्ण, मन बार बार पूछ रहा हैं ,तुम कब आओगे ? वैसे तो तुम हर जन्माष्टमी को हर मन्दिर में ,हर घर में आते हो ,पर आकर भी,शायद आते ही नही हो। इस बार एक ही प्रार्थना हैं तुमसे, भारत रूपी गोकुल के किसी न किसी घर में जरुर आओ,एक बार पुनः,कृष्ण,कान्हा बनकर इस भूदेवी के जनों को प्रेम का पाठ सिखलाओ,जीवन का मंत्र कंठस्थ कराओ,क्योकि तुम अब भी नही आए तो यह संसार प्रल्यंकित होकर,समाप्त हो जाएगा।
इसलिए हे मुरारी इस बार आओ,क्योकि तुम्हारी इस राधिका का मन सतत पूछ रहा हैं,तुम कब आओगे ?मोहन तुम कब आओगे ?

Thursday, August 21, 2008

कहाँ खो गई जिन्दगी?


मुंबई का बोरीवली स्टेशन,सुबह के पॉँच बजे का वक़्त, भीड़ की बढती आवाजो के साथलोकल की धडधडाती आवाज,लोकल रुकी,भीड़ का रेला,वायु से भी अधिक तीव्र गति के साथट्रेन में चढा और लोकल चल पड़ीमैं इस सब के लिए बिल्कुल नई थी,भीड़ में धक्के खातीहुई ,ट्रेन की तरफ बढ़ने की जगह; २५ कदम पीछे पहुँच गई,मेरे साथ और कई लोग थे जो ट्रेन में चढ़ नही सके थेअचानक हल्ला हुआ ,शायद कोई गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करतेसमय,गाड़ी के नीचे गिर गया थाकुछ मानवीय अंत:करण वाले मानवो ने उसे बाहरनिकालने की कोशिश की,पर;तब तक देर हो चुकी थी .इस वाकये ने मुझे झिंझोड़ कर रखदिया,उस दिन मन किसी काम में नही लगा ,फ़िर धीरे-धीरे इस सब की आदत होनेलगी,रोज़ सुबह की धक्कम- धुक्की के बाद गाड़ी पकड़ना,इस बीच कुछ इंसाननुमा प्राणियोको गिरते-पड़ते देखना ,और बाकियों का इसे नज़रंदाज़ कर देनामैं देखती, यह सब प्राणीसुबह - बजे अपने- अपने होटल रूपी घरो से निकल जाते,दिन भर दौड़ भाग करते,कभीऑफिस के लिए,कभी काम के लिए,कभी चार पैसो के लिए,कभी जीने के लिएरात के-१०-११-१२ बजे कभी शायद अपने उन्ही घरो को पहुँचते , जहा इनका कुछ क्षणों का बसेराहुआ करता

फ़िर मैं दुसरे शहरो में गई, देखा; वहां लोग रोज़ ही अप- डाउन कर रहे हैं,और नही भी करेतो भी सुबह के निकले,रात तक ही घर पहुँच रहे हैं,किसी को,किसी के लिए फुर्सत नहीहैं....पत्नी को पती के लिए,भाई को बहन के लिए,सास को ससुर के लिए,बच्चो को माँ -बाप केलिएसब अपने अपने कामो में व्यस्त हैं . कोई दुखी हैं,परेशान हैं,पर कोई नही जो उसकेदुःख को सुने,चार अच्छी बातें करे,अरबो-खरबों की इस भीड़ में इन्सान रूपी प्राणी बिल्कुलअकेला हैं

एक समय था जब इस धरती पर इन्सान रहा करता था,वह अपनों से मिलता,उनके सुख दुःख बाटता,उनकी खुशियों में झूमता,गमो में रोता,वह निसर्ग से बाते करता,उसके पास खुदके लिए थोड़ा वक़्त होता,जब वह ख़ुद से बाते करता,अपने शौक पुरे करता,वह गुनगुनाता,गाता,नाचता,चित्रकारी करता,कभी कोई कविता रचता,अपनों के साथ बैठकर खाना खाताकभी वह इन्सान इस धरती पर रहता था हम समय से होड़ करते हुए जाने कितना आगे बढ़ गए,सुख सुविधा के कितने ही उपकरण हमने बना लिए,पर वक़्त की इस दौड़ में;हमारे अन्दर का मानव कही पीछे ही छुट गया,मशीनों के इस युग में हम सिर्फ़ एक मशीन बनकर रहे गए,जो सारे काम करती हैं,पर उन कामो का आनंद नही ले पाती,वह पकाती हैं पर उसे खाने का आनंद लेना नहीआता,उसके पास रिश्ते हैं पर उन्हें निभाने का वक़्त नही, क्यों हुआ ऐसा ?

कही कही हम सब(सम्पूर्ण मानवजाती ) इसके लिए जिम्मेदार हैं, प्रतियोगिता के इस युग में हमने अपने आपको ही सर्वाधिक छला,कष्ट दिया हैंप्रतियोगिता में बने रहना और जीतने की जिद्द बुरी नही हैं,यह नही हो तो इन्सान लक्ष्य विहीन पथिक मात्र हैं,परन्तु इस जिद्द के चलते,अपने अंतर्मन की हत्या कर देना ,कहाँ तक उचित हैं ?कहाँ तक सही हैं अपनी संवेदनाओ को मार देना? आज का जीवन बहुत कठिन हैं,जीने के लिए सौ बहाने चाहिए,और उससे भी अधिक धन. पर थोड़े धन में,थोड़े सुखो में,इन्सान सुखी रहना सिख लेता तो,हमारे अन्दर का मानव मन तो जिन्दा रहता,कुछ ऐसे भी इन्सान हैं,जो इस सब में से थोड़ा समय स्वयं के लिए,अपनों के लिए चुरा लेते हैं,कभी बैठ कर कुछ लिखते हैं,कभी दूसरो से कुछ सुनते हैं,कुछ चित्रकार आज भी निसर्ग से रंग चुरा लेते हैं,पर ऐसे प्राणी जो वास्तविक अर्थो में इन्सान कहलाये ,कम ही बचे हैं कही कही हम सबके मन में इच्छा हैं ,जीने की ,अपनों के साथ कुछ पल गुजारने की,हम सब जानते हैं की जिन्दगी खो गई हैं,और उसे हमे लौटा लाना हैं,इससे पहले की आने वाली पीढिया पुरी तरह मशीनीकृत हो जाए,मानव के वेश में रोबोट हो जाए





फोटो :http://static.flickr.कॉम,www.abc.नेट से साभार

Wednesday, August 20, 2008

गृह सुचना एवम सर्वेक्षण सह सर्वोच्च अधिकारी अर्थात कामवालीबाई

सुबह के बजे थे, मैं नाश्ता बनाने में व्यस्त थी,पर आज मन कही और था ,किसी और की यादो में खोया हुआ,किसी और के इंतजार में मग्न ,अंतर्मन में बैठी सुरली गायिका मधुर मधुर स्वर में गुनगुना रही थी ,"जरा सी आहट होती हैं तो दिल ये कहता हैं......कही ये वो तो नही ........कही ये वो तो नही.........कही ये वो तो नही....."अचानक दरवाजे की घंटी बजी ,पैरो को मानो पंख लग गए ,मैं हवा में उड़ती सी,पुरे उत्साह से भागती हुई दरवाजे तक गई,पुलकित मन से दरवाजा खोला,पर इस बार भी हर बार की तरह घोर निराशा मेरे हाथ लगी,आगंतुक कोई और था वह नही बुझे मन से,बोझिल कदमो से किचन में आई देखा तो सेंडविच बुरी तरह से जल चुका था ,यह वा सेंडविच था , जले हुए सेंडविच खाने के बाद पतिदेव को अब यह तीसरा जला सेंडविच खाना असंभव प्रतीत हुआ और बहुत पेट भर गया कहते हुए, ऑफिस जाने के लिए निकल गए

११ बज चुके थे मुझे अब कुछ कुछ गुस्सा भी आने लगा था,अचानक टेलीफोन की घंटी बजी,आशाओ ने फ़िर एक बार अपने पंख फैलाये,तुंरत फोन उठाया,सामने से आवाज आई ,मी सकू बाई बोलते ...............इसी आवाज को सुनने के लिए मन सुबह से बेचैन था,ह्रदय उत्सुक था,मैंने कानो को पुरा खोल लिया और कहा, बोलो... वह बोली,ऐसा हैं की मेरी तबियत ठीक नही मैं आज और कल नही आउंगी मानो वज्रपात हुआ मुझपर ,फ़िर भी खुदको सँभालते हुए कहा अच्छा ठीक हैं परसों तो आओगी ?जवाब मिला सोचूंगी ,- दिन में जाउंगी

११ दिन बीत चुके थे ,मेरा गुस्सा चरम सीमा पर था ,बिचारे पतिदेव और नन्ही बेटी मौन व्रत धारण कर चुके थे ,उन्हें समझ गया था की अगर वो कुछ बोले तो इस कामवाली की छुट्टी से उत्प्प्न क्रोधाग्नि उन्हें भी जला देगी ,इस बीच कई बार फोन किए उसे। संदेश मिलता फ़ोन इस व्यस्त हैं ,स्विच ऑफ़ हैं आदि आदि ,१२वे दिन वह आई....
....थकी, हारी, परेशान,मैंने पूछा क्या हुआ?क्यों इतनी छुटीया? ??
जाने क्या हुआ!!!!!!!!!!वह दनदनाती हुई बोली, देखो मुझसे फालतू सवाल मत पूछा करो, मैं काम छोड़ के जा रही हूँ .................. और वह चली गई

फ़िर नई काम वाली आई,ध्यान काम में कम और ताक- झाक में ज्यादा,वैसे भी वह कामवाली लगती नही थी,हाथ में मोबाईल,ब्रांडेड कपड़े ,खुले बाल,सधा हुआ मेकप और निर्धारित मांगे.. मैं हफ्ते मैं दिन छुट्टी करुँगी,हर महीने बोनस चाहिए ,रोज़ एक बार नाश्ता चाहिए,निर्धारित काम से एक काम ज्यादा नही करुँगी...
फ़िर भी काम पर रखा, रखनी तो थी ही,चार ही दिनों में उसे पता चल गया की घर में कौनसी चीज़ कहाँ हैं ?कहाँ पैसे हैं,कहाँ कपड़े हैं,कहाँ कागज़ हैं
जाने क्या क्या पूछती रहती ,आप के घर में कौन कौन हैं?सासु माँ की सासु माँ क्या करती हैं,नन्द की जेठानी की लड़की की सासु की बहन की बेटी कैसी हैं?मैं त्रस्त आख़िर मैंने उसे काम पर रखा था ,इसलिए की मेरी संगीत साधना,लेखन आदि के लिए मुझे समय मिल सके,पर यहाँ तो सारा समय इनके जवाब देने में ही जा रहा था,पर कुछ कह नही सकती थी,एक दिन मुझे किसी ने पूछा"राधिका तुम्हारी सहेली के पति के भाई को अच्छी नौकरी मिली?या वह अभी भी दुकान में कम कर रहा हैं? मैं हतप्रभ!!!!!!!!!!!!!!इन्हे कैसे पता?कहा, मिली,पूछ ही लिया; कैसे पता चला ?उन्होंने कहा,तुम्हारी कला बाई ने बताया.
समझ गई कि इस कला बाई को यह कला भी खूब आती हैं, तब से सावधान रहने लगी। कही कुछ निकल जाए उसके घर में रहते समय मेरे मुंह से। जब वह घर में होती मैं और मेरे पति आपस में बात ही नही करते थे

महीने काम और फ़िर छुटियो पर छुट्टिया कभी कोई मर गया हैं,कभी कोई जिन्दा हो गया हैं,कभी किसी कि शादी हैं,कभी कही घुमने जाना हैं
हद तो तब हो गई जब मैंने उससे छुट्टिया करने को कहा और उसने इस धमकी के साथ काम छोड़ दिया कि अब वह किसी बाई को मेरे यहाँ नही आने देगी।

१५-२० दिन नई काम वाली ढूंढ़ते निकल गए,सच कोई काम वाली आने को तैयार ही नही,मैं जब बाहर निकलती,औरते अजीब सी नजरो से मुझे देखती , एक दुसरे के कानों में कुछ कहती,मैं समझ नही पा रही थी की आख़िर हो क्या रहा हैं ?एक दिन हिम्मत करके ऐसे ही एक समूह से जाकर पूछा ,आख़िर उन्हें मुझसे समस्या क्या हैं ?सुनकर मेरे उपर मानो बिजली गिर गई पता चला की उस बाई ने सब जगह यह फैला दिया हैं,की मुझे जाने कौनसी मानसिक बीमारी हैं,जिसके चलते हर किसी पर चोरी का इल्जाम मढती हूँ और हर छोटी मोटी बात पर हंगामा खड़ा कर देती हूँ

अब कही जाकर समझ आई कामवाली बाई से बड़ा कोई अधिकारी हैं हो सकता हैं,यह आजकल की सुचना सर्वेक्षण अधिकारी तो हैं ही,साथ ही सब अधिकार प्राप्त सर्वोच्च अधिकारी भी हैं,जो कभी भी, कुछ भी कर सकती हैं यह महान हैं ,इनकी महानता शब्दों में कही जा सकती हैं छन्दों में अभिव्यक्त की जा सकती हैं।

इस सबके बाद एक ही व्रत लिया,चाहे थक के चूर क्यु हो जाऊ,चाहे लिख पाऊ या लिख पाऊ,चाहे आसमान टूटे,चाहे जमीन हिले,चाहे कुछ क्यों हो जाए मैं कभी कामवाली नही रखूंगी ..................