Wednesday, August 13, 2008

जाने क्या चाहे मन बावरा

मन संसार की सबसे बड़ी पहेली,मन संसार का सबसे जटिल तत्व,मन विचारो कि झुरमुट में बसी एक छोटी सी झील,मन ................बस मन!
मन कब क्या चाहे कोई नही जानता,क्यो इतने सवाल पूछे यह भी कोई नही जानता,मन मनुष्य का सबसे सगा मित्र,मन ही आत्मन,मन ही ईश्वर।

मन न जाने कब गुनगुनाये,कब छोटे बच्चो कि तरह न जाने क्या जिद्द कर जाए?मन कभी ज़मी पर कभी आसमा पर कभी तितली बन पेडो कि शाखों पर,कभी मछली बन लहरों कि हिलोरो पर,मन कभी मुस्कुराता हुआ,कभी बिन बात रोता हुआ,कभी हसता हुआ ,कभी सुनाता हुआ,मन कि महिमा मन ही जाने ।

इस मन को समझने के लिए न जाने कितने ऋषि मुनियों ने युगों युगों तक तपस्या की ,न जाने कितने ग्रंथो का वाचन किया,न जाने कितने तीरथ धाम घूम लिए,इस मन के चक्कर में न जाने कितने गृहस्थ साधू हो गए,न जाने कितने आश्रम गुरुकुल खुल गए,पर ये मन और इसकी चाहत फ़िर भी कोई नही समझ पाया।

कहते हैं मन पर काबू रखो,इसे नियंत्रण में रखो पर भाई ये तो हवा हैं,इसे कौन रोक पायेगा?तूफानी नदिया हैं बाँध भी टूट जाएगा,मन पंछी हैं,हर मौसम उड़ता जाएगा,मन लोकगीत हैं अनजाने ही स्फुटित हो जाएगा ।

कौन समझ पाया हैं मन की माया ?हम उसे पूर्व मैं ले जाना चाहते हैं और वह जाता हैं उत्तर में ,हम उसे अपनी समझाते हैं वह हेम अपनी ही धुन पर नचवाता हैं ।

मन सबसे कुछ अलग हैं,वह अद्भुत हैं आलौकिक हैं,अनादी हैं,मन श्रृंगार हैं, वात्सल्य हैं, मन एक बूंद हैं जीवनदाई जल सी,मन सागर हैं,मन प्रेम हैं ,मन आनंद हैं।

मन को पुरी तरह कोई न समझ सका न समझ पायेगा ,मन पर कोई पहरे न बिठा सका न बिठा पायेगा,क्योकी मन स्वयम्भू हैं, मन ही शिव हैं मन ही राम है वह हमारी आत्मा का हिस्सा हैं,मन त्रिगुनो त्रिलोको तीर्थो से परे हैं, मन परे हैं चतुर्वेदो से ,धर्मो से,दर्शनों से।

मेरी नज़र में मन ही एकमात्र सच्चा मित्र हैं मानव का,इसलिए जब भी लगे जाने क्या चाहे मन बावरा... तो दिमाग चलाना बंद करे,खुदको एकदम चुप करे और सुने मन की,उसकी कही करे ,मन के नाम पर स्वछंदता की मैं हिमायती नही,पर सबसे प्रेम करे,सारी धरणी को मन से चाहे ,फ़िर मन आपको कभी नही भटकायेगा,सच कहे तो वह कभी नही भटकाता,भटकते हम हैं और दोष देते हैं मन को,मन जैसा कोई संगी नही साथी नही सरल नही,अपने मन से पूछे और जिन्दगी की हर परेशानी को दूर करे,मन की माने,उसकी चाहतो को जाने,और कहे -- मन की बात बताऊँ मैं मन की बात बताऊँ क्या -क्या बात उठत मन मोरे सब कह कर समझाऊँ मैं मन की बात बताऊ।

12 comments:

कुश said...

aapne to mere man ki baat kah di.. sach mein ye man bahut hi chanchal hota hai..

नीरज गोस्वामी said...

शब्द शब्द सत्य कहती हुई पोस्ट...मन रे तू काहे ना धीर धरे....
नीरज

cartoonist ABHISHEK said...

एक दम सटीक....!!!

डॉ .अनुराग said...

कठिन पहेली है...कुछ हल मिले तो बताये ....

सुशील छौक्कर said...

मन की अच्छी कही।

ललितमोहन त्रिवेदी said...

मन हमेशा उस वस्तु पर टिकता है जो हमारे पास नहीं है ,उपलब्ध को त्यागकर वह हमेशा अनुपलब्ध की ओर भागता रहता है !जो हमारे पास है उस पर मन को टिकाने पर ही आनंद की अनुभूति हो सकती है !मन जैसे दुरूह विषय पर लिखने के लिए बधाई !

Udan Tashtari said...

बेहतरीन लेखन.

Radhika Budhkar said...

aap sabhi ko bahut bahut dhanywad

Shiv Kumar Mishra said...

मन से लिखा गया...और मन से पढ़ने लायक बेहतरीन पोस्ट.

शोभा said...

मन को पुरी तरह कोई न समझ सका न समझ पायेगा ,मन पर कोई पहरे न बिठा सका न बिठा पायेगा,क्योकी मन स्वयम्भू हैं, मन ही शिव हैं मन ही राम है वह हमारी आत्मा का हिस्सा हैं,मन त्रिगुनो त्रिलोको तीर्थो से परे हैं, मन परे हैं चतुर्वेदो से ,धर्मो से,दर्शनों से।बहुत अच्छा लिखा है। बधाई

शोभा said...

मन को पुरी तरह कोई न समझ सका न समझ पायेगा ,मन पर कोई पहरे न बिठा सका न बिठा पायेगा,क्योकी मन स्वयम्भू हैं, मन ही शिव हैं मन ही राम है वह हमारी आत्मा का हिस्सा हैं,मन त्रिगुनो त्रिलोको तीर्थो से परे हैं, मन परे हैं चतुर्वेदो से ,धर्मो से,दर्शनों से।बहुत अच्छा लिखा है। बधाई

Demo Blog said...

hi,
i am not a hindi student,i studied hindi up to 10th class only but i think i have a bond with hindi.

this writing was one of masterpiece i feel..

Kheteshwar:
http://www.orkut.com/Profile.aspx?uid=13645509671501872640